हनुमान

इनके अन्य नाम हैं- हनुमान, महावीर, पवनसुत, आंजनेय, रामदूत, रामदास, केसरीनंदन तथा अन्य भी कई। हनुमानजी को कभी एक हाथ में पर्वत धारण करके उड़ते हुए दिखाया जाता है, कभी रामजी की शरण में उनके चरणों के पास पालथी मारकर चुपचाप बैठे हुए दिखाया जाता है, तो कभी उन्हें अपना सीना चीरकर उसमें विराजमान राम और सीता को दिखाते हुए व्यक्त किया जाता है।

हनुमान हिन्दुओं के सर्वाधिक लोकप्रिय देव हैं। वे सेवा, भक्ति और समर्पण के साक्षात रूप हंै। वे शिव के अवतार हैं। उन्हें पवन एवं अंजनी देवी का पुत्र भी कहा जाता है। उभरी हुई ठुड्डियों के कारण उन्हें ‘हनुमान‘ कहा जाता है। उनकी बंदर जैसी पूँछ है। दिखने में वे अर्द्धमानव लगते हैं, लेकिन उनके गुण ऐसे अलौकिक हैं कि हम सभी उन गुणों को स्वयं में पाना चाहेंगे। उनमें अद्भुत शारीरिक और आत्मिकशक्ति है, जैसे साहस एवं शौर्य (महावीर), निडरता तथा राम एवं सीता के प्रति भक्ति। उच्च प्रतिभा, सत्यवाणी, ज्ञान के सागर तथा अन्य महान गुण। उनका अपनी इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण है।

सभी खिलाड़ी और योग करने वाले व्यक्ति हनुमान को अवश्य पूजते हैं। हनुमान के हाथ में पर्वत अपने स्वामी राम के द्वारा सौंपे गये कार्य को पूर्ण करने के उनके समर्पण भाव का प्रतीक है। उनके हृदय में विराजित राम और सीता दर्शाते हैं कि वे अपने आराध्य के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित हैं। रामदरबार में उनकी मुद्रा उन्हें राम के सेवक के रूप में व्यक्त करती है। यह उनकी शांति, मस्तिष्क की केन्द्रीयता और नियंत्रण तथा सत्य के प्रति उनकी निष्ठा को भी बताती है। हनुमान की तरह हमें अपने मस्तिष्क और बुद्धि को अपनी आत्मा के नियंत्रण में लाकर अपनी आत्मा की सेवा करनी चाहिए।

पवन के पुत्र के रूप में हनुमान प्राण (साँस) की शक्ति को व्यक्त करते हैं। ज्ञात हो कि साँस और मस्तिष्क दोनों परस्पर जुड़े हुए हैं। वे सीता (बुद्धि) का पता लगाकर उन तक पहुँचने में सफल रहे। इसका अर्थ हुआ कि शांत एवं नियंत्रित मस्तिष्क हमारे अंदर की छिपी सम्भावनाओं का पता लगा सकता है।

चालीस दोहों वाले ‘हनुमानचालीसा’ का पाठ करोड़ों हिन्दू प्रतिदिन करते हैं। इसमें रामायण में वर्णित हनुमान जी के गुणों एवं कार्यों का वर्णन किया गया है। इसका पाठ हमें इन गुणों को समाहित करने की याद दिलाता है-

  • शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक शक्ति।
  • विस्तृत ज्ञान (ज्ञान गुण सागर), सर्वोच्च विद्या।
  • विनम्रता, राम (आत्मा) की सेवा।
  • निडरता, निःस्वार्थता, निरभिमानिता तथा ‘कुछ भी असम्भव नहीं की वृत्ति।’