देवों के प्रतीक अर्थ

देवी-देवताओं के प्रतीक का अर्थ है-इनकी पूजा-अर्चना के तौर-तरीकों में निहित वस्तुओं को जानकर उन्हें अपने जीवन में उतारना।

भारत में जितने भी देवता हैं, उन सभी के प्रतीक अर्थ हैं। ये अर्थ किसी वस्तु, व्यक्ति, घटना तथा किसी विचार आदि से जुड़े होते हैं। चाहे वह लिखा जाने वाला नाम हो, या बोला जाने वाला। यहाँ तक कि चित्रात्मक भाषा भी! ये सभी उस भाषा के जानकार व्यक्तियों को किसी वस्तु की जानकारी देते हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि प्रतीकों के अर्थ का सीधा संबंध भाषा और संस्कृति से होता है।

किसी भी प्रतीक का क्या अर्थ होगा, यह उस भाषा के बोलने और सुनने वाले पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए किसी हिन्दू के लिए स्वास्तिक एक पवित्र चिह्न है, जबकि एक यहूदी को यही नाज़ीवाद का चिह्न दिखाई देता है। कृष्ण भक्त को गाय में कृष्ण दिखाई देंगे, लेकिन दूसरों को उसमें मातृ-पशु दिखाई देगा। प्रतीकों के अर्थ स्थान पर भी निर्भर करते हैं। उदाहरण के लिए, किसी मकान पर लगा हुआ क्राॅस का चिह्न चर्च का अर्थ देता है, जबकि यदि वही चिह्न जमीन पर हो, तो वह कब्रिस्तान को बताता है। यदि यही क्राॅस उत्तर पुस्तिका में लगा हुआ हो, तो इसका अर्थ हो जायेगा कि लिखा गया उत्तर गलत है।

हिन्दू धर्मग्रंथ बार-बार इस बात पर जोर देते हैं कि तुम वही हो, जो वह है- ‘तत् त्वम् असि’। ‘वह’ यानी ‘परम तत्व’। सभी कर्मकाण्ड, पूजा, प्रार्थना, ध्यान, योग, मंत्र, वेदांत तथा सेवाकार्य आदि इसी उद्देश्य से बनाये गये हैं कि व्यक्ति अपने निजी विश्वासों से ऊपर उठकर उस परम तत्व को जानकर उससे एकाकार हो सके। इस परमतत्व को आप भगवान या ऐसा कुछ भी कह सकते हैं।

देवी-देवताओं के प्रतीक का अर्थ है-इनकी पूजा-अर्चना के तौर-तरीकों में निहित वस्तुओं को जानकर उन्हें अपने जीवन में उतारना। हिन्दू एक ही परमसत्य की आराधना करते हैं। यह बात अलग है कि उस परमसत्य के रूप अनेक होते हैं, तथा वह निराकार भी हो सकता है। ये देवी-देवता ईश्वर की अनेक शक्तियों और गुणों का प्रतिनिधित्व करते हंै। यदि हमें श्रृंगार, हाथ में धारण की गई वस्तुओं, उनकी आसपास की वस्तुओं, उनके वाहन आदि का उचित ज्ञान हो जाता है, तो इससे हमें उनके साथ अच्छी तरह जुड़ने तथा अपने उद्देश्य को प्राप्त करने में मदद मिलती है। अंततः जब हम इनके बारे में उचित प्रकार से समझ जाते हैं, तब पता चलता है कि ये वही शक्तियाँ और गुण हैं, जो हममें ही मौजूद हैं। ये हमारी अपनी आत्मा के ही गुण हैं। प्राण, मस्तिष्क, शरीर एवं ज्ञान पर समुचित नियंत्रण, प्रशिक्षण और अभ्यास के द्वारा हम स्वयं की खोज कर सकते हैं।

देवी-देवताओं के चित्रों अथवा मंदिरों की अपनी-अपनी श्रद्धा, अपने-अपने धर्म और मनःस्थितियों के अनुसार व्याख्या की जा सकती है। ज्ञान, भक्ति, कर्म और विभिन्न विचारों को मानने वाले लोगों के लिए इन प्रतीकों के अलग-अलग अर्थ होते हैं, और इससे तब तक कोई अंतर नहीं पड़ता, जब तक हमें उनसे अपने उत्थान में मदद मिलती है। एक तरफ प्रतीकों के बहुत ही सामान्य अथवा परम्परावादी अर्थ हो सकते हैं, तो गहन रहस्यवादी एवं आध्यात्मिक व्याख्या भी। इनमें से सही कौन से हैं? जिस अर्थ से हमारा आध्यात्मिक विकास होता हो, और जो हमें एक उत्तम मानव बनाता हो, वही हमारे लिए सही व्याख्या है।

लोग मूर्ति, प्रतीक या चित्रों की पूजा नहीं करते। लोग इन सबका उपयोग अपनी चेतना को केन्द्रित करने के लिए करते हैं, अथवा इसलिए करते हैं, जिससे वे अपनी मानसिक शक्तियों को जागृत करके अपने नकारात्मक गुणों एवं आदतों को खत्म कर सकें। जिस प्रकार एक राष्ट्रीय ध्वज हममें राष्ट्रभक्ति की भावना पैदा करता है, उसी प्रकार एक मूर्ति हमारे अंदर के गुणों को हममें पैदा करती है। भारत में 33 करोड़ देवताओं की कल्पना महज एक रूपक है, जो बताती है कि ईश्वर के विषय में असंख्य तरीकों से सोचा जा सकता है, और प्रत्येक देवता में कुछ विशेष गुण होते हैं। ये विभिन्न देवता न तो पूरी तरह स्वतंत्र हैं, और न ही एक-दूसरे के विरोधी, बल्कि सभी एक ही सर्वोच्च सत्ता के अधीन हंै। इस पुस्तिका में हिन्दुओं द्वारा पूजे जाने वाले कुछ लोकप्रिय देवी-देवताओं के प्रतीक अर्थों की जानकारी दी गई है। हमें विश्वास है कि जब भी आप पूजा, प्रार्थना और ध्यान करेंगे, उस समय ये आपकी अवश्य सहायता करेंगे।

 
  • गणेश

    गणेश के कई अन्य नाम भी है, जैसे विनायक (ज्ञानी), विघ्नेश्वर (विघ्न का नाश करने वाले), गजानन (हाथी के मस्तक वाला) और गणपति (नेतृत्वकर्ता)। गणेश में नेतृत्व की क्षमता है, और ऐसा विश्वास है कि उनकी कृपा होने पर किसी भी काम में सफलता मिल जाती है।

    गणेशजी का हाथी का मस्तक उनकी तीव्र बुद्धि और विशाल चिंतन का प्रतीक है। हाथी का जीवन प्रफुल्लता से पूर्ण होता है, जो गरिमा और आत्म-सम्मान की भावना से आती है। हाथी भोजन करते समय सामग्री को अपने चारों ओर बिखेरता है।

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  • शिव

    ब्रह्मा एवं विष्णु के साथ ही भगवान शिव इस जगत की तीन आलौकिक शक्तियों में से एक हैं। शिव का अर्थ है-कल्याणकारी। शिव विनाश के सिद्धांत का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस जगत में जो भी दृश्यमान वस्तु है, वह नश्वर है। शिव मूलतः जगत के विकास की प्रक्रिया में विनाश के कारक हैं। इसीलिए उन्हें गलती से ‘विनाश का देव’ भी कह दिया जाता है, यद्यपि निर्माण के लिए विनाश आवश्यक होता है। शिव को या तो ध्यान की मुद्रा में बैठे हुए दिखाया जाता है अथवा पार्वती तथा पुत्र गणेश एवं कार्तिकेय के साथ बैठे हुये जो नंदी तथा गणों से घिरे रहते हैं।

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  • महाकाली

    दिव्य माँ और उनकी मानवी प्रजा के बीच प्रेम एक विलक्षण संबंध है जिसकी अभिव्यक्ति विविध प्रकार से की गई है। भयकारी आकृति को धारण करने के बावजूद भी भयावह स्वरूप से संपन्न माता महाकाली एक ऐसी देवी हैं जिनके साथ भक्तजन अत्यंत आत्मीयता और स्नेह का अनुभव करते हैं। इस संबंध के अंतर्गत भक्त तो एक बालक बन जाता है और महाकाली अपने बच्चे का सदा सर्वदा ध्यान रखने वाली माता का रूप धारण करती हैं। लपलपाती जीभ और मुण्ड माला के साथ भगवान शिव के वक्षस्थल पर नृत्य करती हुई देवी को प्रायः लोग अत्यंत भयानक और वीभत्स समझते हैं, जबकि यही वह स्वरूप था जिसने रामकृष्ण परमहंस को समाधि में प्रवेश करने की प्रेरणा दी थी।

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  • दुर्गा

    दुर्गा का शाब्दिक अर्थ होता है- अत्यंत विशाल या अगम्य। काली के रूप में वे क्रोध एवं भय का प्रतिनिधित्व करती हैं। वे केवल उनको भयभीत करती हंै, जो दुष्कर्मों एवं आसुरी कार्यों में लगे हुए हैं। अम्बा अथवा पार्वती के रूप में वे अच्छे लोगों एवं भक्तों के लिए प्यारी माँ हैं। दुर्गा के रूप में वे हम सब में निहित वह आध्यात्मिक ऊर्जा हैं, जिसको सही प्रकार से जागृत एवं उपयोग करने से सभी नकारात्मक वृत्तियां खत्म हो जाती हैं। यह ऊर्जा निश्चित रूप से काम करती है।

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  • लक्ष्मी

    लक्ष्मी को सामान्यतः लाल कमल पर बैठे हुए अथवा खड़ा दिखाया जाता है। वे लाल वस्त्रों में होती हैं, और उनके चारों ओर प्रचुर मात्रा में सोना-चांदी जैसी कीमती वस्तुएँ, हाथी और तेल के दीपक आदि होते हैं। उन्हें विष्णु जी के साथ दर्शाया जाता है, जहाँ वे शेषशायी विष्णु जी के पैरों के निकट बैठी होती हैं।

    लक्ष्मी विष्णु जी की शक्ति हैं, जो विश्व की रक्षा करने वाले प्रमुख भगवान हंै। लक्ष्मी के कारण ही विश्व में सामंजस्य है। विश्व के पोषण के लिए जिन वस्तुओं की आवश्यता होती है, लक्ष्मी जी वे सब प्रदान करने वाली देवी हैं।

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  • हनुमान

    हनुमानजी को कभी एक हाथ में पर्वत धारण करके उड़ते हुए दिखाया जाता है, कभी रामजी की शरण में उनके चरणों के पास पालथी मारकर चुपचाप बैठे हुए दिखाया जाता है, तो कभी उन्हें अपना सीना चीरकर उसमें विराजमान राम और सीता को दिखाते हुए व्यक्त किया जाता है।

    हनुमान हिन्दुओं के सर्वाधिक लोकप्रिय देव हैं। वे सेवा, भक्ति और समर्पण के साक्षात रूप हंै। वे शिव के अवतार हैं। उन्हें पवन एवं अंजनी देवी का पुत्र भी कहा जाता है। उभरी हुई ठुड्डियों के कारण उन्हें ‘हनुमान‘ कहा जाता है। उनकी बंदर जैसी पूँछ है।

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  • सरस्वती

    सरस्वती सामन्यतः कमल पर विराजित होती हैं। उनके हाथ में वीणा होती है। वे श्वेत वस्त्र धारण करती हैं और उनका वाहन भी श्वेत हँस होता है।

    सरस्वती का शाब्दिक अर्थ है-वह, जो सत्व का सार देता है। वे आध्यात्मिक ज्ञान एवं प्रज्ञा की देवी हैं। वे विश्व के निर्माणकर्ता ब्रह्मा की शक्ति हैं, जिन्होंने ब्रह्माण्ड की रचना के लिए उनको ज्ञान दिया। इनकी ही कृपा से हमें ज्ञान की प्राप्ति होती है, और हम कला में पारंगत होते हैं। सरस्वती हमारी बुद्धि एवं वाणी के माध्यम से व्यक्त होती हैं। उनके धवल वस्त्र पवित्रता के प्रतीक हैं, क्योंकि ज्ञान को भ्रमरहित और स्पष्ट होना चाहिए। वीणा आनंद एवं सामंजस्य का प्रतीक है

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  • राधा-कृष्ण

    राधा और कृष्ण के अनेक प्रकार के कलात्मक चित्रांकन किए जाते हैं। कुछ खड़ी अवस्थाओं में होते हैं तो कुछ बैठी अवस्था में या फिर नृत्य की मुद्राओं के साथ। देखने में वे ऐसे प्रतीत होते हैं जैसे कि प्रेम की भावना से युक्त कोई तरुण युगल हो। वास्तव में है भी ऐसा ही। राधा और कृष्ण परस्पर प्रेमानुभूति से युक्त शाश्वत दिव्य स्वरूपों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

    लोगों को दिखाने के लिए ही परमात्मा ‘पुरुष’ स्वयं मानव रूप में कृष्ण बनकर अवतरित हुए। प्रकृति ने ‘राधा’ का स्वरूप धारण किया जो समस्त सृष्टि का प्रतीक है।

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  • jke njckj

    राम दरबार या राम परिवार को कई देवताओं के साथ दिखाया जाता है - श्रीराम, श्री लक्ष्मण, श्री सीता जी और श्री हनुमान जी। किसी-किसी चित्र-अंकन में श्रीराम के दो अन्य भाई - भरत तथा शत्रुघ्न भी साथ होते हैं। लगभग सभी राम-मंदिरों में राम दरबार होता है।

    माहात्म्य: संपूर्ण राम दरबार ‘त्वम्’ का प्रतीक रूप है यानी तुम्हारा अपना समग्र रूप। तुम्हारे पास तुम्हारे अपने कई भाग होते हैं - जैसे शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा। प्रथम तीन आसानी से सबके द्वारा जाने जाते हैं। अंतिम, आत्मा जो हमारे अंदर दिव्य ज्योति स्वरूप है - सरलता से अनुमान योग्य है। यह आत्मा ही है जो कि शरीर, मन और बुद्धि को क्रियाशील और परस्पर संयुक्त रखता है।

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  • कृष्ण-अर्जुन और रथ

    आप महाभारत के ऐतिहासिक युद्ध को भूल सकते हैं परंतु उसमें निहित अर्थ को कभी न भूलें। वास्तव में, तो हमारे अंदर प्रतिदिन वह युद्ध चल रहा है। यह युद्ध हमारे अंदर विद्यमान बुरी और अच्छी विशेषताओं एवं भावनाओं का है। अच्छाई और बुराई में सतत संघर्ष होता रहता है। इन दो विपरीत शक्तियों के संघर्ष में कृष्ण (आत्मा, उच्चतम प्रज्ञा) सदा धर्म की तरफ रहता है। धर्म वह सत्य है जो धारण करता है। इसके विपरीत है विभ्रम जो नीचे गिराता है। यदि आप चाहते हैं कि आपका मार्गदर्शक बनकर प्रभु आपके साथ रहें तो स्वयं को दिव्य स्वभाव और धर्म के गुणों से संयुक्त करिए। क्योंकि जिधर धर्म है उधर भगवान् है। यह रथ सीधे-सीधे आत्मानुभूति अर्थात् पूर्णता के लक्ष्य की ओर खींचा जाना चाहिए। अश्व तो रथ को गड्ढ े में ले जा सकते हैं यदि वे नियंत्रण में न हों, मार्ग को सही तरह से न देखें, थके हांे या फिर उनकी इच्छा ही आगे बढ़ने की न हो।

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  • नटराज

    नटराज का अर्थ है नृत्य का राजा या सर्वोत्तम नर्तक। नटराज के रूप में शिव को नृत्य करते हुए दिखाया जाता है। यह सृष्टि और संहार दोनों से संबद्ध परमानन्द का नृत्य है। यह सृष्टि और प्रलय के ब्रह्माण्डीय चक्र का प्रतीक है। मानवीय स्तर पर यह जीवन और मृत्यु तथा अन्यान्य परिवर्तनों का द्योतक है। इस नृत्य की मुद्रा प्रतीकात्मक रूप से प्रतिपल परिवर्तित और गतिमान् विश्व को अभिव्यक्त करती है। जो व्यक्ति इसके निहित अर्थ को समझ जाता है और नृत्य की लय के साथ नृत्य करता है वह समस्त सीमाओं से पार हो जाता है।

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  • शिव लिंग

    कोई प्रतीक चेतना के किसी एक स्तर का रूप या निशान होता है, परंतु वह उससे उच्चतर स्तर के सत्य को अभिव्यक्त करता है। उदाहरण के लिए केसरिया रंग सभी धार्मिक परंपराओं में अनेक मार्गों में से किसी एक मार्ग के द्वारा त्याग और सत्य के अन्वेषण का प्रतिनिधित्व करता है।

    शिवलिंग या लिंगम् ईश्वर के क्रियात्मक स्वरूप को द्योतित करता है। संस्कृत में ‘लिंग’ का अर्थ होता है

    ‘निशान’ या ‘चिह्न’। इसीलिए शिवलिंग का अर्थ है ‘कल्याणकारी’ (शिव) ‘प्रतीक’ (लिंग) - जो हमें ईश्वर की अनन्त विशेषताओं का बोध कराता है।

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