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यह प्रतीकात्मक चित्र बताता है कि किस प्रकार मन और इंद्रियों को नियंत्रित किया जाना चाहिए। यह बहुत ही संक्षिप्त, सुंदर, रूपकात्मक और अर्थपूर्ण गंभीर चित्रांकन है। इसमें रथ शरीर है। रथी अर्जुन, जीव का प्रतीक है। सारथी कृष्ण आत्मा (अपना सब, उच्चतम प्रज्ञा या कभी-कभी बुद्धि) का प्रतीक हैं। सारथी कृष्ण मन के आंतरिक संघर्ष रूप कुरुक्षेत्र के मैदान में आसुरी स्वभाव (कौरव) और दैवी स्वभाव (पाण्डव) की सेनाओं के मध्य रथ को ले जाते हैं। लगामें मन की वृत्तियाँ हैं। चक्षु, कर्ण, नासिका, जिह्वा, त्वचा आदि इंद्रियाँ अश्व हैं। इंद्रियों के समस्त विषय रथ के मार्ग हैं जिस पर वे दौड़ती हैं। यह सब क्रियाकलाप आत्मा, उच्चतम प्रज्ञा, इंद्रिय और मन के संयुक्त प्रयास से संभव होता है।

कृष्ण-अर्जुन और रथ

आप महाभारत के ऐतिहासिक युद्ध को भूल सकते हैं परंतु उसमें निहित अर्थ को कभी न भूलें। वास्तव में, तो हमारे अंदर प्रतिदिन वह युद्ध चल रहा है। यह युद्ध हमारे अंदर विद्यमान बुरी और अच्छी विशेषताओं एवं भावनाओं का है। अच्छाई और बुराई में सतत संघर्ष होता रहता है। इन दो विपरीत शक्तियों के संघर्ष में कृष्ण (आत्मा, उच्चतम प्रज्ञा) सदा धर्म की तरफ रहता है। धर्म वह सत्य है जो धारण करता है। इसके विपरीत है विभ्रम जो नीचे गिराता है। यदि आप चाहते हैं कि आपका मार्गदर्शक बनकर प्रभु आपके साथ रहें तो स्वयं को दिव्य स्वभाव और धर्म के गुणों से संयुक्त करिए। क्योंकि जिधर धर्म है उधर भगवान् है। यह रथ सीधे-सीधे आत्मानुभूति अर्थात् पूर्णता के लक्ष्य की ओर खींचा जाना चाहिए। अश्व तो रथ को गड्ढे में ले जा सकते हैं यदि वे नियंत्रण में न हों, मार्ग को सही तरह से न देखें, थके हांे या फिर उनकी इच्छा ही आगे बढ़ने की न हो।

अपने रथ को कैसे चलाना है, सीखिए-

  • रथ - शरीर (लौकिक देह), वह साधन जिसके द्वारा आत्मा, बुद्धि, मन और इंद्रियाँ कार्य करती हैं।
  • सारथी - आत्मा (अहम्, उच्चतम प्रज्ञा या बुद्धि) जो मन को सही निर्देश देता है।
  • रथी - जीव (व्यक्तिगत आत्मा, चेतना का शुद्ध केन्द्र) जो केवल निष्पक्ष द्रष्टा है।
  • अश्व - इंद्रियाँ (ज्ञानेन्द्रियाँ - चक्षु (देखना), कर्ण (सुनना), नासिका (सूँघना), जिह्वा (स्वाद लेना), त्वचा (स्पर्श करना)) - जिनके द्वारा हम बाहरी दुनिया का अनुभव करते हैं।
  • लगाम - मन, जिसके द्वारा इंद्रियाँ कार्य करने या अनुभव करने के निर्देश पाती हैं।
  • मार्ग - विश्व और हमारी स्मृति में रहने वाले इच्छा और अनुभव करने के अनन्त विषय।
  • रथ के चक्र - सम्यक् प्रयत्न।
  • लक्ष्य - आत्मानुभूति या पूर्णता।
  • कुरुक्षेत्र युद्धक्षेत्र - आन्तरिक युद्धभूमि, जिसमें व्यक्ति संघर्ष करता है और आंतरिक दुर्गुण रूप शत्रुओं को पराजित करता है।
  • दो सेनाएँ - कौरव (आसुरी स्वभाव) और पाण्डव (दैवी स्वभाव)।
  • तुम्हारा रथ कौन चला रहा है? सामान्यतः हम सारथी को अपना काम नहीं करने देते हैं। लगाम (मन) ही बिना किसी आंतरिक निर्देश के मुक्त भाव से इधर-उधर घूमती हैं और इंद्रियों (अश्वों) को सही राह पर नहीं रहने देती हैं। फलतः अश्व जैसे चाहे वैसे किसी भी मार्ग पर चल पड़ते हैं अपनी पिछली यादगारों (चित्त) के आधार पर। रथ (शरीर) हार जाता है, अश्व (इंद्रियाँ) थक जाते हैं, लगामें (मन) नष्ट हो जाती हैं और सारथी (प्रज्ञा) आलसी हो जाता है। इन सबमें रथी (जीव) की पूर्णतया अवहेलना होती है।
  • अतः सारथी को अपना कार्य करने दो।

जैसे हीं सारथी रूपी प्रज्ञा सुस्थिर हो जाती है और अपने काम में लग जाती है वैसे ही इस तथ्य के प्रति उत्तरोत्तर समझ बढ़ती जाती है कि रथ, अश्व, लगाम, और सारथी का उद्देश्य मात्र रथी अर्थात् जीवात्मा की साधनों के रूप में सहायता करना है।

‘‘ब्रेक पर अपने पैर रखकर वाहन (कार) को मत चलाओ, अपितु जब आवश्यक हो ब्रेक का प्रयोग कार को नियंत्रण में रखने के लिए करो। अशुद्ध विचार, अशुद्ध भावनाएँ, अशुद्ध दृष्टि, अशुद्ध श्रवण जैसे खतरों की स्थितियों में नियंत्रण की आवश्यकता होती है। यदि सचमुच में तुम्हारे पास ब्रेक नहीं है तो निश्चय ही तुम दुःख पाने को तैयार रहो। अश्व जो लगामों द्वारा नियंत्रित नहीं किए जाते, कार जो ब्रेक लगाकर रोकी नहीं जा सकती और एक व्यक्ति जो इंद्रियों का निग्रह करना नहीं जानता, अत्यंत खतरनाक हैं और स्वयं भी विनाश की ओर जा रहे हैं।’’