लक्ष्मी

अन्य नाम- कमला।

लक्ष्मी को सामान्यतः लाल कमल पर बैठे हुए अथवा खड़ा दिखाया जाता है। वे लाल वस्त्रों में होती हैं, और उनके चारों ओर प्रचुर मात्रा में सोना-चांदी जैसी कीमती वस्तुएँ, हाथी और तेल के दीपक आदि होते हैं। उन्हें विष्णु जी के साथ दर्शाया जाता है, जहाँ वे शेषशायी विष्णु जी के पैरों के निकट बैठी होती हैं।

लक्ष्मी विष्णु जी की शक्ति हैं, जो विश्व की रक्षा करने वाले प्रमुख भगवान हंै। लक्ष्मी के कारण ही विश्व में सामंजस्य है। विश्व के पोषण के लिए जिन वस्तुओं की आवश्यता होती है, लक्ष्मी जी वे सब प्रदान करने वाली देवी हैं। वे सौन्दर्य, सामंजस्य एवं संतुलन की भी प्रमुख देवी मानी जाती हैं। लक्ष्मी की उत्पत्ति समुद्र-मंथन से मानी जाती है, जिसके एक ओर सुर थे और दूसरी ओर असुर। इसका अर्थ है कि सफलता की प्राप्ति सतत एवं कठिन प्रयासों से होती है।

लक्ष्मी लाल कमल पर विराजमान हैं। यह कमल आध्यात्मिक स्रोत का प्रतिनिधित्व करता है, जिससे सभी भौतिक पदार्थाें की उत्पत्ति होती है। इसका अर्थ है कि हमारी अपनी ही आंतरिक शक्तियों से हमारी समस्त क्षमताओं को सामने लाया जा सकता है। विष्णु के चरणों के पास बैठी हुई लक्ष्मी का अर्थ है कि उनकी शक्ति मुख्यतः विष्णु की शक्ति है, और उसका उपयोग उन्हीं के उद्देश्यों के लिए होना चाहिए। जिस प्रकार विष्णु अपनी शक्ति का उपयोग इस विश्व की रक्षा के लिए करते हैं, उसी प्रकार हमें भी अपनी शक्ति (धन आदि) का उपयोग विश्व की मदद के लिए करना चाहिए। सम्पत्ति का उपयोग इस विश्व के हित के लिए न करके उसका केवल संग्रह करते जाने का अर्थ है कि हम भगवान विष्णु के कार्य में अपना योगदान नहीं दे रहे है। हाथी के द्वारा अपनी सूंड में पानी को भरकर बिखेरना अकूत आलौकिक सम्पत्ति को बिखेरना ही है। इसका अर्थ है कि जब हम अपनी सम्पत्ति और क्षमता का उपयोग दूसरों तथा अलौकिक उद्देश्यों के लिए करते हैं, तो उनमें निरंतर बढ़ोतरी होती है।

नवरात्र के दिनों में देवियों की, की जाने वाली पूजा में बीच के तीन दिनों में विशेषरूप से लक्ष्मी की पूजा होती है। जब माँ दुर्गा (काली) हमारी बाधाओं (नकारात्मकता) को दूर करती हैं, तभी देवी लक्ष्मी हमें समृद्धि, सामंजस्य और संतुलन प्रदान करती हंै, और ऐसा होने पर ही हमारा मस्तिष्क, ज्ञान (सरस्वती) जैसे उच्च गुणों की ओर अग्रसर होता है।