महाकाली

दिव्य माँ और उनकी मानवी प्रजा के बीच प्रेम एक विलक्षण संबंध है जिसकी अभिव्यक्ति विविध प्रकार से की गई है। भयकारी आकृति को धारण करने के बावजूद भी भयावह स्वरूप से संपन्न माता महाकाली एक ऐसी देवी हैं जिनके साथ भक्तजन अत्यंत आत्मीयता और स्नेह का अनुभव करते हैं। इस संबंध के अंतर्गत भक्त तो एक बालक बन जाता है और महाकाली अपने बच्चे का सदा सर्वदा ध्यान रखने वाली माता का रूप धारण करती हैं। लपलपाती जीभ और मुण्ड माला के साथ भगवान शिव के वक्षस्थल पर नृत्य करती हुई देवी को प्रायः लोग अत्यंत भयानक और वीभत्स समझते हैं, जबकि यही वह स्वरूप था जिसने रामकृष्ण परमहंस को समाधि में प्रवेश करने की प्रेरणा दी थी।

कोई व्यक्ति महाकाली के प्रतीकवाद को तभी अच्छी तरह समझ सकता है जब वह उसके अर्थों की अच्छी जानकारी प्राप्त करता है। भगवान् शिव ‘परम तत्व’ हैं और देवी माँ उनकी शक्ति हैं, जिनको ‘प्रकृति’ के रूप में जानना चाहिए। संपूर्ण ब्रह्माण्ड या फिर विश्व की अभिव्यक्ति उस परम तत्त्व की शक्ति के नृत्य का एक प्रकार है। शक्ति का अदृश्य आधार शिव हैं।

देवी माँ के द्वारा धारण किया गया प्रत्येक मुण्ड एक ब्रह्माण्ड है। यहाँ ब्रह्माण्ड को मुण्ड के रूप में दिखाया गया है क्योंकि जो भी अस्तित्व में आता है उसका नाश होता है। मुण्डमाला को धारण करने वाली देवी यह संदेश देती हैं कि ‘जिस विश्व के पीछे तुम उन्मत्त हो वह तो वस्तुतः नाशवान् और परिवर्तनशील है।’ अतः विनष्ट हो गए ब्रह्माण्डों की श्रृंखला को सूचित करती है देवी महाकाली की मुण्डमाला।

देवी की लंबी जीभ ‘ब्रह्माकार वृत्ति’ का प्रतीक है जब मन ब्रह्म की ओर प्रवाहित होने लगता है, तथा द्वैत और अनेकता के राक्षसों का भक्षण करते हुए वह आत्मानुभव में संपूर्ण विश्व को समा लेता है।

महाकाली का स्वरूप केवल उनके लिए भयकारी है जो उनके रूप के तात्पर्य को नहीं समझते हैं। देवी तो अज्ञान और दुष्प्रवृत्तियों की पराजय के लिए कठोर एवं कटिबद्ध है। अहंकार, अज्ञान, क्रोध, ईष्र्या, स्वार्थ, नीचता, लालच और घमण्ड पर जय और इनके पराभव के लिए माँ की शक्ति और सामथ्र्य निश्चित और सफल हैं।

अब महाकाली के इतने शक्तिशाली कार्यों को कौन-सी सामथ्र्यवान् शक्ति सहारा देने के योग्य है? केवल भगवान् शिव! शिव तो माँ को अपना नाटक करने के लिए एक आधार देते हैं। वे तो अपने अनन्त तपस्

वैराग्य, प्रज्ञा और आंतरिक शांति के साथ उन्हें अपनी स्वीकृति प्रदान करते हैं। इसी को प्रतीकात्मक तरीके से दर्शाया जाता है-भूमि पर नीचे पड़े हुए शिव और उन पर नृत्य करतीं तीन गुणों से निर्मित प्रकृति रूप् महाकाली।

शरीरों के पूर्ण क्षय एवं नाश का स्थान श्मशान है। श्मशान शरीरों की अंतिम गति को जतलाता है, जहाँ बौद्धिक मूल्यांकन से बढ़कर एक यथार्थ और गहरी अनुभूति होती है। शरीरों के नश्वर स्वभाव को समझकर, अपने वास्तविक स्वरूप को अच्छी तरह जानने के लिए, यह एक अतीव शक्तिशाली अनुभव सिद्ध होता है।

महाकाली का काला रंग उनके सर्वग्रहणशील और अनुभवातीत स्वरूप का प्रतीक है। जैसे सारे रंग काले रंग में विलीन हो जाते हैं, वैसे ही जो कुछ भी अभिव्यक्त होता है वह अंततः महाकाली में समाविष्ट हो जाता है।