राधा-कृष्ण

राधा और कृष्ण के अनेक प्रकार के कलात्मक चित्रांकन किए जाते हैं। कुछ खड़ी अवस्थाओं में होते हैं तो कुछ बैठी अवस्था में या फिर नृत्य की मुद्राओं के साथ। देखने में वे ऐसे प्रतीत होते हैं जैसे कि प्रेम की भावना से युक्त कोई तरुण युगल हो। वास्तव में है भी ऐसा ही। राधा और कृष्ण परस्पर प्रेमानुभूति से युक्त शाश्वत दिव्य स्वरूपों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

लोगों को दिखाने के लिए ही परमात्मा ‘पुरुष’ स्वयं मानव रूप में कृष्ण बनकर अवतरित हुए। प्रकृति ने

‘राधा’ का स्वरूप धारण किया जो समस्त सृष्टि का प्रतीक है। राधा और कृष्ण के साथ होने का अर्थ है कि परमात्मा (कृष्ण) और प्रकृति (राधा) एक दूसरे से अभिन्न हैं। एक चाँदी के चम्मच की तरह ही समझिये। चाँदी और चम्मच कहने को अलग-अलग हैं पर फिर भी एक दूसरे से अभिन्न हैं।

बिना कृष्ण के हम प्रकृति (सृष्टि) को उसके वास्तविक रूप में नहीं देख सकते हैं। हम तन्तु के बिना पट की कल्पना नहीं कर सकते। तन्तु और पट पृथक्-पृथक् होकर भी एक-दूसरे में अभिन्न हैं, एक दूसरे का रूप हैं। तन्तु और पट का एकत्व राधा और कृष्ण के स्वरूप को समझने के लिए अच्छा उदाहरण है।

श्रीकृष्ण भगवान् विष्णु का अवतार हैं। इनको भगवान का आनन्द-अवतार माना जाता है जिसमें भगवान् के हर्ष, आनन्द और सौंदर्य पक्षों का अवतरण होता है। संपूर्ण प्रकृति में परिव्याप्त सौंदर्य की परिपूर्णता को दर्शाता है - उनका मोर-मुकुट। उनका श्यामल वर्ण ‘अनन्त’ का प्रतीक है - अनन्त व्याप्ति, अनन्त ज्ञान, अनन्त प्रेम, इत्यादि जो विश्व के कण-कण में फैला हुआ है। दिव्य आत्माएँ गोपियाँ हैं जो दुनियादारी के नित्य कार्यों में व्यस्त दिखाई देती हैं, कृष्ण उनको पुकारते हैं। श्रीकृष्ण की बाँसुरी से निकलने वाला मधुर संगीत गोपियों (आत्माओं) को उनके पास खींच कर लाने का माध्यम बनता है। राधा असीम आकांक्षा का प्रतिनिधित्व करती हैं। यह राधा की निरंतर चाहत (कामना) ही है, सच्ची प्रेम की अवस्था, जो कृष्ण को मानव रूप में लाती है। एक मनुष्य भगवान् के प्रति नौ प्रकार से भक्ति भावना को प्रकट कर सकता है। राधा उनमें से सर्वोच्च भक्ति को संसूचित करती हैं।

सामान्यतया हम अपने आत्मा की आकांक्षा (उत्कण्ठा) को नहीं समझ पाते हैं। अपने हृदय एवं मन को झकझोरने की आवश्यकता है जिससे आंतरिक ‘राधा’ की पुकार सुनाई पड़े और आत्मा (कृष्ण) और उसकी सृष्टि (राधा) एक हो जाए। इस अवस्था में पहुँचते ही हमारा जीवन सच्चा वृंदावन बन जाता है। हमारी चेतना कृष्ण के साथ तरंगित होने लगती है और हमारे कार्यकलाप उसकी इच्छाओं के अनुरूप प्रवाहित होने लगते हैं।