राम दरबार

राम दरबार या राम परिवार को कई देवताओं के साथ दिखाया जाता है - श्रीराम, श्री लक्ष्मण, श्री सीता जी और श्री हनुमान जी। किसी-किसी चित्र-अंकन में श्रीराम के दो अन्य भाई - भरत तथा शत्रुघ्न भी साथ होते हैं। लगभग सभी राम-मंदिरों में राम दरबार होता है।

माहात्म्य: संपूर्ण राम दरबार ‘त्वम्’ का प्रतीक रूप है यानी तुम्हारा अपना समग्र रूप। तुम्हारे पास तुम्हारे अपने कई भाग होते हैं - जैसे शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा। प्रथम तीन आसानी से सबके द्वारा जाने जाते हैं। अंतिम, आत्मा जो हमारे अंदर दिव्य ज्योति स्वरूप है - सरलता से अनुमान योग्य है। यह आत्मा ही है जो कि शरीर, मन और बुद्धि को क्रियाशील और परस्पर संयुक्त रखता है।

  • लक्ष्मण शरीर के प्रतीक हैं। वे शक्तिशाली हैं और राम की इच्छानुसार कार्य करने को तत्पर रहते हैं।
  • हमारी बुद्धि का प्रतिनिधित्व सीता जी करती हंै। यह विशुद्ध बुद्धि है जो आत्मा के सन्निकट रहती है। सीता जी पूरी तरह राम को समर्पित हैं। इसी तरह शुद्ध बुद्धि सदा आत्मा की सेवा में सहायक रहती है।
  • हनुमान जी हमारे मन का प्रतिनिधित्व करते हैं। हनुमान जी राम और सीता जी के पैरों के पास विराजमान होते हैं, संपूर्ण भक्ति की भावना के साथ, सदैव उनकी इच्छाओं के अनुसार कार्य करने के लिए तत्पर की मुद्रा में। शांत मन ही विशुद्ध बुद्धि और आत्मा की सेवा में रहता है। ऐसा मन न तो इधर-उधर भटकता है और न इंद्रियों के पीछे भागता है। वह तो अपने से ऊपर की शक्तियों के आदेश का अनुपालन करता है।
  • हमारी आत्मा का प्रतिनिधित्व करते हैं श्रीराम। राम का श्यामल वर्ण अनंत और तल्लीन नीले आसमान की तरह है। हमारी आत्मा भी अनंत है। आत्मा तो शरीर, मन और बुद्धि के साम्राज्य पर शासन करता है। उसके रहने से ही शरीर, मन और बुद्धि एकजुट होकर कार्य करते हैं। अपने आत्मा के संपर्क में आकर हमें अपनी दिव्यता का आभास होना चाहिए जिससे वह हमारे जीवन पर सुशासन करने में समर्थ रहे।

अतः जब शरीर, मन और बुद्धि समग्रतया आत्मा के संपर्क में रहते हैं और उसके आगे स्वयं को समर्पित कर देते हैं, जिससे आत्मा उनके कार्यों का निर्देशन कर सके, तब हमारा जीवन ‘अयोध्या’ बन जाता है। एक ऐसा स्थान जहाँ न कलह है, न तनाव। तब तो हमारे जीवन में हर्ष, सौहार्द, ज्ञान और संपूर्णता की स्थापना हो जाती है क्योंकि यही आत्मा का वास्तविक स्वरूप है।

अगली बार जब भी तुम राम-दरबार का कोई मंदिर देखो तो याद करना कि यही तो तुम (त्वम्) हो जो इन मूर्तियों में प्रतिबिम्बित हो रहे हो।