सरस्वती

इनके अन्य नाम है- शारदा, वीणाधारिणी, वागेश्वरी आदि।

सरस्वती सामन्यतः कमल पर विराजित होती हैं। उनके हाथ में वीणा होती है। वे श्वेत वस्त्र धारण करती हैं और उनका वाहन भी श्वेत हँस होता है।

सरस्वती का शाब्दिक अर्थ है-वह, जो सत्व का सार देता है। वे आध्यात्मिक ज्ञान एवं प्रज्ञा की देवी हैं। वे विश्व के निर्माणकर्ता ब्रह्मा की शक्ति हैं, जिन्होंने ब्रह्माण्ड की रचना के लिए उनको ज्ञान दिया। इनकी ही कृपा से हमें ज्ञान की प्राप्ति होती है, और हम कला में पारंगत होते हैं। सरस्वती हमारी बुद्धि एवं वाणी के माध्यम से व्यक्त होती हैं। उनके धवल वस्त्र पवित्रता के प्रतीक हैं, क्योंकि ज्ञान को भ्रमरहित और स्पष्ट होना चाहिए। वीणा आनंद एवं सामंजस्य का प्रतीक है, जो ज्ञान एवं प्रज्ञा से प्राप्त होता है। श्वेत हँस भेदरहित ज्ञान का प्रतीक है, जो सार-सार को ग्रहण करता है एवं थोथे को छोड़ देता है। (माना जाता है कि हँस में दूध से पानी को अलग करने की क्षमता होती है)। मोर विशुद्ध सौन्दर्य का प्रतीक है, जो प्रज्ञा में निहित होता है। आसन के रूप में खिला हुआ कमल चिद् शक्ति (पवित्र चेतना) का प्रतिनिधित्व करता है, जो सभी ज्ञान का उद्गम स्रोत है। सरस्वती की चार भुजायें हमारे चरित्र के चार पक्ष-मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार के प्रतीक हैं। इन सभी प्रतीकों का अर्थ है कि प्रज्ञा के रूप में सरस्वती का निवास हमारे अन्दर ही है, जो सुप्तावस्था में रहती है, और जब एक बार हमारा मस्तिष्क संवाद करना और उत्तेजित होना बंद कर देता है, तब वह शांत और संतोषप्रद हो जाता है। ऐसी स्थिति में जब हमारी विशुद्ध बुद्धि (हमारे अंतःकरण में स्थित हमारी प्रज्ञा) स्वयं को कोमल किंतु दृढ़ स्वर में व्यक्त करना शुरु कर देती है, तब भ्रम समाप्त हो जाते हैं, और केवल स्पष्टता ही शेष रहती है।

सरस्वती की पूजा एवं प्रार्थना सभी करते हैं। बच्चे पढ़ाई शुरु करने से पहले उनकी प्रार्थना करते है तथा वे लोग भी उनका आशीर्वाद लेते हैं, जो आगे बढ़ना चाहते हैं। नवरात्रि के नौ दिनों के अंतिम तीन दिन सरस्वती की आराधना होती है। जब दुर्गा (काली) हमारी सभी बाधाओं (नकारात्मकता) को दूर कर देती हंै, तब लक्ष्मी हमारे भौतिक जीवन में सामंजस्य और संतुलन लाती है। इसके बाद ही हमारा मस्तिष्क प्रज्ञा (सरस्वती) की प्राप्ति के लिए अग्रसर होता है।